Wednesday, August 22, 2012

अब्दुल शर्मा की विदाई


अब्दुल शर्मा की विदाई

सुबह के 8 बजे थे, हल्की बारिश हुई थी, इसलिए मौसम बड़ा प्यारा था। हाथ में चाय का प्याला थामें, ऐसी चुस्की लगा रहा था वो, मानों ये उसकी जिंदगी की आखिरी चुस्की हो। बाकायदा पलथी मारे आराम से बैठा था वो, ना बीते हुए कल का ध्यान, ना ही आने वाले कल की फिक्र। आज की भी कोई चिंता नहीं थी। दिमाग में चल रहा था तो बस वो पल जिसे वो अपने तरीके से जी रहा था। गरमा गरम चाय की चुस्कियां लगाता वो, अब्दुल शर्मा था। आप सोच रहे होंगे कि भला ये कैसा नाम हुआ। इसका तर्क कहानी के अगले कुछ पड़ावों में मिल जाएगा। पहले अब्दुल शर्मा के शाही अंदाज़ों से भरी जिंदगी की बात कर लें। पलथी मार के बैठना उसकी आराम तलबी नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी। अब्दुल शर्मा पैरों से अपाहिज था। उसे किसी भी बात की चिंता या फिक्र इसलिए नहीं थी, क्योंकि वो किसी रईस खानदान का चिराग था। या किसी बड़ी विरासत का वारिस । ऐसा कुछ नहीं था। अब्दुल शर्मा तो महज एक भिखारी था। कोई अगर कुछ दे दो तो खा पी कर अपना पेट भर लेता और बढ़ जाता अपनी जिंदगी की अगली चुनौतियों की ओर। किसी ने कुछ पैसे दे दिए और कभी मौका लगा तो अपने मन माफिक चीज खरीद कर खा ली। यही थी अब्दुल शर्मा की ज़िंदगी। तन पर एक फटा सा कुर्ता था जो इतना बदरंग हो चुका था कि ये पता लगाना मुश्किल था कि उसका रंग कभी क्या रहा होगा। चेहरे पर झुर्रियां, आंखे डबडबाई सी मालूम होती, लगता जाने कितने सवाल पूछ रहीं हों, और जिसका जवाब किसी के पास नहीं। अब्दुल के अब्दुल शर्मा नाम के पीछे का कारण अब्दुल का अपना फलसफा था।  अब्दुल समाज की उस खूबसूरत प्रथा की निशानी था जिसे लोग प्यार कहते हैं। प्यार शुरु तो आंखों से होता पर खत्म जिस्मानी संबंधों पर। फिर वजूद में आते, ऐसे ही तमाम अब्दुल जिनके जीवन का असली मकसद क्या है, शायद ऊपर वाले को भी नहीं पता। अब्दुल को भी नहीं पता था कि वो इस दुनिया में आया कैसे। ख़ैर हम भी क्यूं उलझें समाज की ऐसी घिनौनी प्रथा में। अब्दुल ने खुद ही अपना नाम अब्दुल शर्मा रख लिया था। अब्दुल एक नेक दिल इंसान था पर खाने पीने का शौकीन भी। उसने अपना नाम अब्दुल शर्मा इसलिए रख लिया जिससे वो इस दुनिया को चलाने वाले परवरदिगार के हर रुपों और उसके बनाए इंसानी पुतलों के करीब रह सके। नाम अब्दुल था इसलिए मस्जिद के मुहाने पर बैठ जाता, आने जाने वालों से जो कुछ मिलता उससे गुजारा चलाता। ठीक ऐसा ही वो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ कर करता, नाम अब्दुल शर्मा जो था। ना मस्जिद में उसे नमाज पढ़नी होती, ना ही मंदिर में पाठ पूजा करनी। अब्दुल को मुहल्ले में रहने वाला हर बड़ा बूढ़ा यहां तक कि बच्चा बच्चा जानता था। उसे लोग कई सालों से उसी मुहल्ले में देख रहे थे। ये किसी को भी नहीं पता था, कि वो आया कहां से और कब। मेरा नाम राहुल है। मैंने अब्दुल शर्मा को बहुत नजदीक से देखा था। वो मेरे मुहल्ले में ही घूमता फिरता रहता था। मुहल्ले के पास ही एक बाजार था। थोड़ी दूर पर एक चौड़ी सी मेन रोड जिस पर गाड़ियां किसी रॉकेट जैसी दौड़ती भागती नज़र आती। अक्सर अब्दुल यहीं पर घूमता फिरता रहता था। मैं भी अपने बचपन से थोड़-थोड़ा बाहर आ चुका था। कहुं तो मैं थोड़ा सा बड़ा  हो चुका था। लेकिन सच कहूं तो मैं अब भी एक बच्चा ही था। मैंने अब्दुल चाचा को बचपन से अब तक देखा था। वो ना किसी से झगड़ते और ना ही किसी को कुछ गलत कहते। प्यार की बोली और समझदारी ही अब्दुल को सबसे अलग बनाती थी। कई बार हंसी खेल में वो कुछ ऐसी बातें कर जाता कि हर कोई दंग रह जाता। अब्दुल एक भिखारी था, सो भीख में किसी ने कुछ दिया तो ठीक, नहीं दिया तो भी ठीक। लेकिन उसके मुंह से दुआएं सबके लिए ही निकलती। लेकिन अब्दुल शर्मा यानि मेरे अब्दुल चाचा को चाय बेहद पसंद थी। लिहाजा मुहल्ले की एक चाय की दुकान पर उनका रोज़ाना जाना तय था। अब्दुल चाचा हर मौसम में उस चाय की दुकान में सुबह 8 बजे पहुंच जाते। बशर्ते दुकान खुली हो। चाय वाला राकेश भी दिल से बहुत आला इंसान था। अब्दुल शर्मा के पहुंचते ही सारे ग्राहकों को पीछे कर अब्दुल को चाय और खाने के लिए दो चार बिस्कुट दे देता। खास बात तो ये कि राकेश अब्दुल से पैसा भी नहीं लेता। यही हर रोज़ चलता रहता। चूंकि मेरा घर चाय की दुकान के पास ही था तो मैं अक्सर किसी ना किसी वजह से वहां से गुजरता, तो अब्दुल चाचा पर नजर पड़ ही जाती और उनसे दुआ सलाम भी हो ही जाता था।  मेरे मुहल्ले का नाम पवित्र नगर था । मुहल्ले में कोई भी जात-पात, अमीर-गरीब जैसी चीजों पर ध्यान नहीं देता। हर कोई सबकी मदद के लिए हर वक्त तैयार रहता। जैसा मुहल्ले का नाम वैसे ही यहां के लोग। ये सिर्फ मैं नहीं कह रहा, जो हमारे मुहल्ले के बारे में जानता वो हर इंसान भी यही कहता। सब कुछ अच्छा चल रहा था। हर रोज़ की तरह ही सुबह का सूरज अपने पूरे शबाब पर था। सूरज का रंग भी मुहब्बत और  खुशी की तरह सुर्ख लाल दिखाई पड़ रहा था।  हर कोई अपने अपने कामों में लगा हुआ था। दिन धीरे धीरे चढ़ रहा था। दोपहर लगभग 1 बजे के आस पास अचानक मस्जिद के मुहाने पर एक धमाका हुआ। पता लगा कि 15 से 20 लोग घायल हो गए और 2 बच्चों की मौत हो गई। कोई हालातों को समझ ही पाता कि पूरे पवित्र नगर में ऐसी मार काट मची कि पवित्र नगर की एक-एक गली अपवित्र सी दिखने लगी। जहां कल तक प्यार और अपनेपन की इबारत लिखने को बेताब रहते थे लोग। कल तक जो लोग सबको ऊपर वाले की नेमत मानने का दावा करते नहीं थकते थे। आज वो सड़कों पर हिंदू और मुस्लिम के नारे लगा रहे थे। दिल में नफरत की आग लगाए पूरे पवित्र नगर को जला कर राख कर देना चाहते थे। हर कोई अपने समुदाय से अलग इंसान को पागल कुत्ते की तरह ढूंढ रहा था, जैसे मानों सदियों से चली आ रही कोई दुश्मनी निभा रहें हों। पूरे पवित्र नगर में नालियों में खून की धारा बह रही थी। माहौल पूरी तरह तनावभरा हो गया। फिर क्या पुलिस और कुछ और सुरक्षा बलों ने इलाके को अपने कब्ज़े में ले लिया। इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया। दो चार दिन बाद माहौल थोड़ा शांत हुआ तो हर कोई अपने अपने परिवार के लोगों की खोजबीन में जुट गया। किसी का बेटा बिछड़ गया, तो किसी के मां बाप। तो किसी का कोई और। मुहल्ले से बाहर निकलते ही कुछ दूर पर एक चर्च था। अपनों की तलाश करते लोग इस उम्मीद के साथ चर्च के पास पहुंचे कि शायद उसके आस पास उनका कोई अपना मिल जाए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि चर्च का दरवाजा खुलते ही उनके होशफाख्ता हो जाएंगे। इत्तेफाक से किसी ने चर्च का दरवाज़ा खोला तो अंदर का मंजर देखते ही वहां मौजूद हर शख्स हैरान था और अपने को कोस रहा था। चर्च के अंदर करीब बीस पच्चीस हिंदू और मुस्लिम बच्चे अपने अब्दुल शर्मा चाचा के साथ महफूज थे। दंगे के वक्त अब्दुल उन सबको लेकर चर्च में इसीलिए दाखिल हो गया था क्योंकि चर्च में खतरा बहुत कम था। मुहल्ले से बाहर होने के चलते चर्च तक दंगों की लपट नहीं पहुंच पाई। सब अपने अपने बच्चों को देखकर खुश थे। अब्दुल ने ऐसा काम कर दिया था जिसका कोई मोल ही नहीं था। मैं ये सब इसीलिए जानता हूं, क्योंकि चर्च में अब्दुल चाचा की निगरानी में महफूज बच्चों में से एक मैं भी था। हर कोई इस त्रासदी और पवित्र नगर को अपवित्र करने का जिम्मेदार खुद को मान रहा था।  लेकिन दुख इस बात का ज्यादा था कि दंगे में अब्दुल चाचा भी बुरी तरह घायल हो गए थे, और उनकी सांसे टूट रहीं थीं। मानों जिंदगी कई सवाल छोड़ जाने को बेताब थी और सांसों ने जिंदगी का दामन छोड़ देने की ठान ली थी। और आखिरकार हुआ वही जो कोई नहीं चाहता था। अब्दुल शर्मा सबको छोड़ उस दुनिया में चला गया, जहां ना तो कोई आपाधापी थी, ना ही समाज के कथित नियम कायदे और कानून। बिल्कुल असली पवित्रनगर के जैसी वो दुनिया होगी जिसमें अब्दुल चाचा ने कदम रख दिया था। लेकिन सबके दिलों में अब्दुल ने एक टीस और एक सबक जरुर छोड़ दिया था। और छोड़ दिए इस समाज के सामने कई सवाल जिसके जवाब आज भी कोई ढूंढ नहीं पाया। उनके इस दुनिया से रुखसत होने के बाद पवित्रनगर के हालात तो सुधर गए।  लेकिन सबके दिलों में एक लकीर भी पड़ गई थी जो पता नहीं कब धुंधली पड़ेगी। पता नहीं कि उस अब्दुल की जात क्या रही होगी, हिंदु - मुस्लिम या कुछ और। लेकिन जो जिंदगी का पाठ अब्दुल ने पढ़ाया वो किसी गीता कुरान में लिखी गईं तमाम बातों से कम भी नहीं है। एक घुमक्कड़ी और फक्कड़ी करने वाला भिखारी जिसे अपनी जिंदगी का होश नहीं था, उसने कितनी जिंदगियों को बचा लिया। मेरा दिल बार बार यही कहता रहता कि काश तुम आज भी मेरे पास होते अब्दुल चाचा।

Tuesday, May 22, 2012

नेताओं की चाल, संसद के साठ साल



नेताओं की चाल, संसद के साठ साल


संसद हुई साठ की, नेताओं को ये ख्याल रहे,

जो हुआ वो ठीक, अब क्या करें ये सवाल रहे,

दे जाएं देश को कुछ खास ना कोई मलाल रहे,

दामन साफ हो इतना, कि इनकी मिसाल रहे,

संसद हुई साठ की, नेताओं को ये ख्याल रहे...



अपने पराए में ना करें फर्क सबके जलाल रहें,

भ्रष्टाचार, अपराध जैसा ना कोई बवाल रहे,

आंसू नहीं अंाखों में उजाले हों ये कमाल रहे,

खुशियों की उड़े खुशबू ऐसे जैसे गुलाल रहे,

संसद हुई साठ की, नेताओं को ये ख्याल रहे...



रूपए से नहीं सबकी दुआआंे से मालामाल रहें,

जनहितकारी बनें कानून संसद का ये हाल रहे,

शायद सदन की गरिमा तब बनी हर साल रहे,

अपने देश में जब इक सशक्त लोकपाल रहे,

संसद हुई साठ की, नेताओं को ये ख्याल रहे...

Monday, November 28, 2011

फेसबुक




फेसबुक

फेसबुक... एक ऐसी सोशल नेटवर्किंग साइट... जिसने इस ग्लोबलाइज्ड दुनिया में लोगों को एक दूसरे से कुछ ऐसे जोड़ा... कि लोग कम्प्यूटर के साथ साथ मोबाइल पर भी ऑनलाइन रहने लगे... इस वेबसाइट का क्रेज शहरों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि इसने गांव में रहने वालों को भी अपना मुरीद बना लिया... इस वेबसाइट के जरिए लोग अपनी बातों को लिखकर दूसरों से आसानी से साझा करते हैं... कोई कवितायें लिखता है तो कोई लेख... कोई इस पर कई तरह की फोटो अपलोड करता है... तो कोई समाज और सरकार से जुड़े मुद्दों और समसामयिक घटनाओं पर टिप्पणी करता है... जिसे फेसबुक पर मौजूद करोड़ों लोग पढ़ते और उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं... लेकिन हम आपको जो बताने जा रहे हैं उसे सुनने के बाद आप चौंक जाएंगे.... अखबार दि संडे टेलीग्राफ के मुताबिक यूरोप में इन दिनों फेसबुक अपने यूजर्स की प्राइवेट सूचनाओं को इकट्ठा कर विज्ञापनदाताओं को बेच रहा है... जबकि फेसबुक ने इस बात से इंकार किया है...
अखबार ने दावा किया है कि फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचारों, सेक्शुएलिटी, धार्मिक मान्यताओं और ठिकानों से संबंधित जानकारियां जुटाने के लिए अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहा है... प्राइवेसी के उल्लंघन को लेकर पैदा हुयी चिंताओं के बाद यूरोपियन कमीशन अगले साल जनवरी में एक निर्देश लाने वाला है, जो ऐसी एडवर्टाइजिंग पर प्रतिबंध लगाएगा... लेकिन इसके पीछे यूजर्स की रजामंदी का तर्क भी दिया जा रहा है.... फेसबुक जो सूचनाएं इकट्ठा करता है वो अमेरिका में कम्प्यूटरों में स्टोर की जाती है.... अगर साइट नए कानून का पालन नहीं करती, तो उसे कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहना होगा... फेसबुक पर हो रही इस तरह की गड़बड़ी को रोकने के मकसद से मौजूदा यूरोपियन डाटा प्रोटेक्शन कानून में जल्द ही बदलाव किये जाएंगे...
फेसबुक से जुड़ा ये कोई पहला मामला नहीं है... इससे पहले भी कई बार फेसबुक को लेकर खबरें आ चुकी हैं मसलन आपके फेसबुक अकाउंट को हैकर्स हैक करने की फिराक में रहते हैं लिहाजा अपना पासवर्ड समय समय पर बदलते रहंे... इसके अलावा खबरें ये भी आईं कि फेसबुक अकाउंट से लॉग आउट करने के बाद भी इससे व्यक्तिगत सूचनाएं चुराये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं... फिलहाल तो यूरोप में ये मामला देखने को मिला है लेकिन भारत में फेसबुक यूजर्स को भी सचेत रहना होगा और तब जब भारत में मौजूदा फेसुबुक यूजर्स की तादाद लगभग 38 करोड़ है जिसके बढ़ने की संभावना लाजमी है...
 

Thursday, November 24, 2011

बैठकी की नई दुनिया



बैठकी की नई दुनिया
एक दौर था जब लोगों के पास वक़्त ही वक़्त था... तब शायद इन्सान की दुनिया उसके इर्द गिर्द  के कुछ ही हिस्सों तक महदूद थी... लेकिन बदलते वक़्त में हमने दुनिया का ग्लोबलाईजेशन देखा... और ये भी देखा कि कैसे हम सब एक दुसरे से दूर होते हुए भी तकनीकी सेवाओं और उपकरणों के ज़रिये कितने पास हैं... पर तस्वीर यहाँ पर थोड़ी सी ऐसे बदल जाती है कि पहले वक़्त था, सुकून था जो आज के दौर में शायद ही मिलता है... इसका कारण ये नहीं कि लोग आज पुराने तरीकों से जीना नहीं चाहते... और ना ही ये कि आज सभी अपने ही बारे में सोचने में लगे हैं... बल्कि ये बदलते वक़्त का ही बनाया एक नए तरीके का प्रयोगात्मक (PRACTICAL LIFE) मंच है, जिसके हम सब किरदार हैं जो अपने अपने अभिनय अंश का इंतज़ार कर रहे हैं... इस बदलती दुनिया में हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए तमाम सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट का जिन्होंने हमें अपने पुराने और बिछड़े हमजोलियों से मिलाया... अगर थोडा और सरल भाषा में कहा जाए तो पहले दोस्तों की बैठकी घर, नुक्कड़ या फिर किसी पेड़ के नीचे होती थी, जो कि अब फेसबुक और ऑरकुट जैसे अड्डों पर होती है... हाँ मज़ा उतना तो नहीं आता जो एक साथ बैठ कर गपबाज़ी करने में आता था लेकिन इतना कम भी नहीं आता... इसलिए थैंक्स इस वैज्ञानिक दुनिया का जिसने हमे ये विकल्प दिया...

Wednesday, July 27, 2011

किसी का गया और किसी को मिला




किसी का गया और किसी को मिला


धमाका चाहे महाराष्ट्र में हो, उत्तर प्रदेश में हो, गुजरात में हो , मध्यप्रदेश में हो या फिर देश के किसी अन्य राज्य में... इनमें मरने वाला सिर्फ एक आम हिन्दुस्तानी होता है... धमाके की लपटें ना तो इनकी जाति पूछती हैं ना हैसियत और ना ही उनकी विचारधारा... ऐसे में सबसे अहम सवाल यही कि आखिर ये कब थमेगा और दूसरा कि लोकतंत्र की आत्मा का खून आखिर कब तक होगा रहेगा... सिर्फ दो ही सवाल नहीं बल्कि कई सवाल छोड़ जाते हैं ऐसे आतंकवादी धमाके... वहीं ऐसी घटनाओं के बाद कौन सी विचारधारा ऐसे मामलों में काम करती है, ये असली मुद्दा है...
ऐसी दर्दनाक घटनाओं का असर सबसे ज्यादा किस पर पड़ता है ये कह पाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है... पर कौन लेगा इस सबकी जिम्मेदारी ये कोई नहीं जानता क्योंकि राजनेता अपना उल्लू सीधा करते हैं... लाशों पर राजनीति शुरू हो जाती है... फिल्मी दुनिया से जुड़े तमाम ऐसे लोग जिन्हें सितारा बनाकर हम अपने दिलों में बैठाते है... सारे बयानबाजी में लगे रहते हैं या फिर घटनाओं के अगले ही दिन वो अपनी जिन्दगी में मसरूफ हो जाते हैं। लेकिन क्यूं गुम हो जाती हैं सिसकियां, क्यूं दफ्न हो जाती है चीख की आवाज, क्यूं सूख जाते हैं आंसू, क्यूं लाशें नहीं दे पाती अपनी दबाही की गवाही... सवाल ये कि कौन समझेगा ये सब... और कौन बढ़ाए कदम इस सबके खिलाफ... फिर अचानक ज़हन में एक बात उठती है कि, हमारी सरकार है ना... पर अगले ही पल वो आवाज भी अपना जवाब खोज ही लेती है कि अगर हमारी सरकार ही संजीदा होती तो ये सब होता क्यं...?
मानते हैं कि 121 करोड़ की आबादी बहुत ज्यादा है ... सबकी सुरक्षा कर पाना थोड़ा कठिन है... और इतनी बड़ी आबादी वाले देश में हर ऐसी घटना को रोक पाना शायद मुमकिन नहीं... कहा ये भी जाता है कि ऐसे मामलों के लिए देश के हर नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा... तो आखिर केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारें अपनी इस नाकामी को खुलकर सबके सामने क्यूं नहीं रखती और क्यूं नहीं कह देती कि देश के हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है... तब ना तो कोई सवाल किए जाएंगे और ना ही सरकार या उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति को जवाब देने के लिए बगलें झांकनी पड़ेगी... पर सरकार ऐसा कह नहीं सकती क्यूं कि ये राज करने की नीति का सवाल है... और जरूरत वोट बैंक की है... लिहाज़ा लाशों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते ये लोग...
बयानों की जलेबी परोसते ये राजनेता आम लोगों को ...तिया समझते हैं... आम लोगों को क्या समझते हैं वो शब्द थोड़ा आपत्तिजनक है इसलिए पूरा नहीं लिख पाया पर आप समझ ही गये होंगे, क्यूंकि यही हकीकत है, ऐसी आतंकवादी घटनाओं में किसी का तो सब कुछ लुट जाता है पर किसी को बैठे बिठाए कुछ मिल भी जाता है... लेकिन ये वही आम आदमी है जो इन्हें सत्ता की कुर्सी पर बैठाता है... और अगर ये आम आदमी अपने पर आ गया और इसका दिमाग थोड़ा सनक गया तो इन सफेदपोश काले लोगों को नाकों चने चबवा देगा... फिर सिर्फ हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचेगा इनके पास... अच्छा तो यही रहेगा कि हर कोई अपनी जिम्मेदारी को समझे... खासकर जिनके कंधों पर ऐसी जिम्मेदारियां डाली गयी हैं... सच ये है कि मौजूदा वक्त में हर आम आदमी सरकार के क्रियाकलापों से परेशान होकर ये कह उठता है कि हमें पसंद नहीं ये राजनेता... लेकिन एक सच ये भी है कि वही आम आदमी ये भी चाहता है कि हमारे यही प्रतिनिधि इंसानी जिन्दगी की अहमियत को समझे और समाज में कुछ अच्छे बदलाव आएं... अच्छा तो यही रहेगा कि हमारे नेता गण जनता की इस आवाज को सुने और अपने भविष्य को सुधार लें वरना कल क्या होगा ये कहना ज्यादा मुश्किल नहीं है...

Thursday, July 14, 2011

ऐसा क्यूँ होता है





ऐसा क्यूँ होता है

सुबह की दहलीज़ पर, उम्मीदों के क़दम थे,
सपनों से भरे अरमान और आशाओं के मन थे.

ना था पता कल का ना ही उस इक पल का,
कि ज़मींदोज़ हो जायेंगे जो खुशियों के महल थे.

ऐसी पड़ी नापाक निगाहें दहशतगर्दों की हम पर,
कहीं चीख कहीं आंसू कहीं खून से लिपटे तन थे.

होश उड़ जाते हैं देखकर लाशों पर सियासत,
देखो बस उनको जिन अपनों के दिल नम थे.

सुबह की दहलीज़ पर, उम्मीदों के क़दम थे,
सपनों से भरे अरमान और आशाओं के मन थे...

Friday, June 17, 2011

बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ये पल...





बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ये पल...


खुश रहो हरदम जिंदगी के साथ,
ना निहारो राहों को ना दिन रात,

सीख लो सब कुछ मगर खुश रहो,
पर रहो वही जो अन्दर से तुम हो,

आंसुओं को ना बनाओ अपना घर
बस आशाओं से देखो इधर उधर

बिना डर राहों पर अपनी तू निकल,
थाम कर हाथ मेरा कहीं दूर चल,

             बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ये पल...


जो होना है यहाँ वो होकर ही रहेगा,
जिंदगी में तुझे बहुत कुछ मिलेगा,

खींच कर चादर ख़ुशी के सपनों की,
रख लो सिर, याद के सिरहाने पर,

दुःख देना तो हकीकत है ज़माने की,
तू बना दे प्यारा हर आने वाला कल,

             बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ये पल...